Aman Singh Singrauli
चितरंगी तहसील परिसर आज उस बदहाली की मिसाल बन चुका है, जहां व्यवस्था का दावा तो बड़ा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत शर्मनाक मूलभूत सुविधाओं का अभाव अब महज असुविधा नहीं, बल्कि आमजन के सम्मान और स्वास्थ्य पर सीधा प्रहार बन गया है सबसे चिंताजनक स्थिति सार्वजनिक शौचालयों की है या तो वे बंद पड़े हैं, या फिर उपयोग के लायक ही नहीं बचे तहसील जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र में रोज़ाना सैकड़ों लोग अपने जरूरी कामों के लिए पहुंचते हैं इनमें महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे भी शामिल होते हैं घंटों इंतजार करने के दौरान जब उन्हें शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा भी नसीब नहीं होती, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का खुला प्रमाण है स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले यहां शौचालय की व्यवस्था थी, लेकिन अब वह या तो ताले में जकड़ी है या बदहाल स्थिति में दम तोड़ रही है। हैरानी की बात यह है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद प्रशासन की ओर से कोई ठोस पहल नहीं की गई सवाल यह है कि क्या जिम्मेदारों की प्राथमिकताओं में आम जनता की बुनियादी जरूरतें शामिल ही नहीं हैं? यह स्थिति न केवल असुविधा बढ़ा रही है, बल्कि जनस्वास्थ्य के लिए भी खतरे की घंटी है। स्वच्छता और सुविधा के बड़े-बड़े दावे करने वाली व्यवस्था यहां पूरी तरह नाकाम नजर आती है अब वक्त है कि प्रशासन नींद से जागे और केवल कागजी दावों से आगे बढ़कर जमीनी सुधार सुनिश्चित करे तहसील परिसर में सुचारू और स्वच्छ शौचालय व्यवस्था तत्काल बहाल की जाए, ताकि आमजन को राहत मिल सके अन्यथा, यह लापरवाही किसी बड़े संकट का कारण बन सकती है और तब जवाबदेही तय करना मुश्किल नहीं होगा।






