15 दिन में चोरी की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
पिछले 5 सालों में सबसे खराब व्यवस्था,नाबालिग विवाह भी…
देवतालाब के ऐतिहासिक मलमास मेले में लाखों श्रद्धालुओं की आस्था उमड़ रही है, लेकिन मेले की सुरक्षा और व्यवस्थाओं को लेकर लगातार गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि जिन अधिकारियों के कंधों पर मेले की जिम्मेदारी है, उन्हीं की मौजूदगी को लेकर अब स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के बीच चर्चा तेज हो गई है।
मेले के लगभग 15 दिन बीत चुके हैं। इस दौरान सोने की चैन, लॉकेट, नकदी सहित 20 से अधिक चोरी की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, लेकिन पता नहीं चल पाया है। वहीं 23 मई को एक नाबालिग विवाह का मामला भी चर्चा में रहा,झगड़े भी हुए लेकिन FIR किसी में नहीं हुई। इसके बावजूद सुरक्षा व्यवस्था में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दे रहा।
दूसरी पाली में थाना प्रभारी की सक्रियता पर सवाल
जानकारी के अनुसार पुलिस अधीक्षक द्वारा मेले की प्रथम पाली की जिम्मेदारी उप निरीक्षक गोविन्द तिवारी को सौंपी गई है, जो सुबह से दोपहर 2 बजे तक व्यवस्थाओं की निगरानी करते हैं।
लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि दोपहर 2 बजे के बाद जब दूसरी पाली की जिम्मेदारी थाना प्रभारी राजेश पटेल के पास आती है, तब मेला परिसर और मंदिर क्षेत्र में उनकी सक्रिय मौजूदगी दिखाई नहीं देती। लोगों का कहना है कि शाम के समय जब मेले में सबसे अधिक भीड़ होती है, तब जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नजर नहीं आते। यही कारण है कि मेला परिसर में मोटरसाइकिलों का जमावड़ा लग जाता है और सुरक्षा व्यवस्था पर लगातार प्रश्नचिह्न खड़े हो रहे हैं।
कंट्रोल रूम में पुलिस या झूला संचालक?
स्थिति यह भी बताई जा रही है कि मेला कंट्रोल रूम, जहां पुलिस की निगरानी और शिकायतों का निस्तारण होना चाहिए, वहां कई बार पुलिसकर्मियों की जगह झूला संचालकों की गतिविधियां दिखाई देती हैं। यदि यह आरोप सही हैं तो सवाल यह है कि कंट्रोल रूम का संचालन आखिर कौन कर रहा है और मेले की सुरक्षा व्यवस्था पर वास्तविक निगरानी किसकी है?
राजस्व अमला भी जिम्मेदारियों से दूर?
पुलिस व्यवस्था पर उठ रहे सवालों के बीच अब राजस्व अमला भी निशाने पर आ गया है। मंदिर प्रबंधन समिति एवं तहसीलदार द्वारा मंदिर परिसर की व्यवस्थाओं की निगरानी की जिम्मेदारी संबंधित हल्का पटवारी को सौंपी गई थी। उद्देश्य था कि श्रद्धालुओं की सुविधा, कतार व्यवस्था, भीड़ प्रबंधन और अन्य व्यवस्थाओं पर नजर रखी जा सके। लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि पटवारी की सक्रियता पूरे दिन दिखाई नहीं देती। उनकी मौजूदगी केवल शाम के समय दान पेटी खुलने और उसमें प्राप्त राशि की गणना तक ही सीमित रह गई है। दिनभर मंदिर परिसर की व्यवस्थाओं की निगरानी कौन कर रहा है, यह सवाल अब आम श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
पुलिस की मौजूदगी में नाबालिग विवाह कैसे हो गया?
सबसे बड़ा सवाल 23 मई को हुए कथित नाबालिग विवाह को लेकर भी खड़ा हो रहा है। जब मेले में पुलिस, राजस्व अमला, मंदिर प्रबंधन समिति और अन्य विभागों की ड्यूटी लगाई गई थी, तब आखिर नाबालिग विवाह जैसी घटना कैसे हो गई? यदि विवाह हुआ तो इसकी जानकारी जिम्मेदार अधिकारियों को समय रहते क्यों नहीं मिली? और यदि जानकारी थी तो उसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए? यह घटना सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
एसपी की फटकार के बाद भी नहीं बदले हालात
गौरतलब है कि मेले के शुरुआती दिनों में ही नवागत पुलिस अधीक्षक द्वारा व्यवस्थाओं को लेकर नाराजगी जताई गई थी। इसके बावजूद यदि चोरी, अव्यवस्था, जिम्मेदार अधिकारियों की अनुपस्थिति और नाबालिग विवाह जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं, तो यह पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
आखिर जिम्मेदार कौन?
मलमास मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब जिम्मेदारी तय है, ड्यूटी निर्धारित है और अधिकारी नियुक्त हैं, तब व्यवस्थाओं की निगरानी आखिर कौन कर रहा है?
आखिर यह कैसी मलमास मेला व्यवस्था है, जहां चोरी की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, जिम्मेदार अधिकारी मौके पर नजर नहीं आते, राजस्व अमला गायब बताया जा रहा है और नाबालिग विवाह जैसी घटना भी हो जाती है?
श्रद्धालुओं के बीच अब एक ही चर्चा है— क्या व्यवस्थाएं वास्तव में प्रशासन के नियंत्रण में हैं, या फिर सब कुछ भगवान भरोसे और सीसीटीवी कैमरों के सहारे चल रहा है?






