खगोलीय गणना और धार्मिक मान्यताओं का अनोखा मेल, समझें खरमास और अधिकमास का अंतर
खरमास और अधिकमास को लेकर अक्सर लोगों में भ्रम रहता है, जबकि ये दोनों अलग-अलग खगोलीय और ज्योतिषीय स्थितियां हैं। सरल शब्दों में समझें तो खरमास सूर्य की स्थिति पर आधारित होता है, जबकि अधिकमास चंद्र और सौर कैलेंडर के बीच संतुलन बनाने के लिए जोड़ा जाता है। मलमास शब्द का उपयोग प्रायः अधिकमास के लिए किया जाता है, जिसे ही पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।
खरमास साल में दो बार आता है। ज्योतिष के अनुसार जब सूर्य धनु राशि और मीन राशि में प्रवेश करते हैं, तब उस अवधि को खरमास कहा जाता है। यह समय आमतौर पर दिसंबर-जनवरी (धनु संक्रांति) और मार्च-अप्रैल (मीन संक्रांति) के बीच पड़ता है। मान्यता है कि इन राशियों में सूर्य का प्रभाव कमजोर हो जाता है, जिससे विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार सूर्य देव के घोड़े थक गए थे, तब उन्होंने अपने रथ में गधों (खर) को जोत लिया, जिससे रथ की गति धीमी हो गई। इसी कारण इस अवधि को “खरमास” कहा गया, जो धीमी गति और ठहराव का प्रतीक माना जाता है।
वहीं अधिकमास, जिसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है, हर साल नहीं बल्कि लगभग 3 साल में एक बार आता है। इसका कारण सौर वर्ष (365 दिन) और चंद्र वर्ष (354 दिन) के बीच का अंतर है। हर साल करीब 10-11 दिनों का अंतर बढ़ता है, जो लगभग 3 साल में एक अतिरिक्त महीने के बराबर हो जाता है। इस अंतर को संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है।
अधिकमास की विशेषता यह है कि इसमें सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती, इसलिए पहले इसे शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता था। लेकिन बाद में भगवान विष्णु ने इसे “पुरुषोत्तम मास” का नाम दिया, जिससे यह पूजा, दान और भक्ति के लिए अत्यंत शुभ माना जाने लगा।
इस तरह स्पष्ट है कि जहां खरमास सूर्य की राशि परिवर्तन से जुड़ा होता है और साल में दो बार आता है, वहीं अधिकमास खगोलीय गणना के संतुलन के लिए जोड़ा जाने वाला अतिरिक्त महीना है, जो लगभग हर तीन साल में एक बार आता है।






