अमन सिंह सिंगरौली
सिंगरौली का आरटीओ कार्यालय एक बार फिर सवालों के घेरे में है इस बार मुद्दा किसी फाइल की देरी या राजस्व वसूली का नहीं, बल्कि पत्रकारों के मोबाइल फोन बाहर रखवाने का है जानकारी के अनुसार, जब कुछ पत्रकार विभागीय जानकारी लेने और अधिकारी से मुलाकात के लिए पहुंचे, तो उन्हें अपना मोबाइल फोन कार्यालय के बाहर जमा कराने को कहा गया फोन एक पहरेदार के पास रखवाए गए। सवाल सीधा है—क्या यह किसी लिखित आदेश के तहत था, या मौखिक निर्देश पर? यदि लिखित आदेश था तो सार्वजनिक क्यों नहीं? और यदि नहीं था, तो क्या यह अधिकारों की मनमानी नहीं? पहरेदार कौन, अधिकार किसके? कार्यालय के बाहर तैनात पहरेदार की भूमिका भी संदेह के घेरे में है क्या वह नियमित शासकीय कर्मचारी है या निजी सुरक्षा कर्मी? यदि निजी है, तो उसे पत्रकारों से मोबाइल जमा कराने का अधिकार किसने दिया? और यदि शासकीय कर्मचारी है, तो क्या उसे इस प्रकार की कार्रवाई का अधिकृत आदेश प्राप्त है?
प्रशासनिक व्यवस्था में अधिकारों की स्पष्ट परिभाषा अनिवार्य है अन्यथा हर मौखिक निर्देश ‘नियम’ बन जाता है और जवाबदेही हवा हो जाती है सुरक्षा या सूचना पर नियंत्रण? शासकीय कार्यालयों में सुरक्षा कारणों से प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं—परंतु इसके लिए स्पष्ट लिखित आदेश, सूचना पट्ट और पारदर्शी प्रक्रिया आवश्यक है। यदि ऐसा कोई आदेश उपलब्ध नहीं था, तो यह कदम पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है पत्रकारों का कहना है कि वे केवल जानकारी लेने पहुंचे थे ऐसे में मोबाइल बाहर रखवाना क्या केवल सुरक्षा का हिस्सा था, या फिर सूचना के प्रवाह पर नियंत्रण की कोशिश? प्रशासन यदि निष्पक्ष और पारदर्शी है, तो उसे कैमरे और रिकॉर्डर से भय क्यों?
पहले भी उठते रहे हैं सवाल – जिले में पूर्व में भी पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस होती रही है ऐसे में यह ताजा प्रकरण प्रशासन और मीडिया के संबंधों में अविश्वास की खाई को और गहरा कर सकता है। लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका केवल खबर छापना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल करना भी है। यदि सवाल पूछने से पहले ही मोबाइल बाहर रखवा दिए जाएं, तो यह व्यवस्था किस दिशा में जा रही है? प्रशासन की अग्निपरीक्षा अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं क्या इस मामले में स्पष्ट स्पष्टीकरण जारी होगा? क्या संबंधित अधिकारी की भूमिका की जांच होगी? या फिर यह प्रकरण भी फाइलों में दबकर रह जाएगा? लोकतंत्र में पारदर्शिता कोई विकल्प नहीं, अनिवार्यता है प्रशासन को तय करना होगा कि वह सवालों से भागेगा या जवाब देगा।






