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Aman Singh Singrauli

सिंगरौली जिले के महाविद्यालयों में इन दिनों जो स्थिति बनी है, वह शिक्षा व्यवस्था की गंभीरता पर सीधा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है एक ही प्राध्यापक को तीन-तीन महाविद्यालयों का प्रभार सौंपना न केवल प्रशासनिक दृष्टि से अव्यावहारिक प्रतीत होता है, बल्कि यह निर्णय पारदर्शिता और निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े करता है मामला शासकीय स्व. जगन्नाथ सिंह स्मृति महाविद्यालय चितरंगी, मॉडल कॉलेज रंपा और शास. प्रधानमंत्री एक्सीलेंस कॉलेज बैढ़न से जुड़ा है जानकारी के अनुसार बैढ़न स्थित एक्सीलेंस कॉलेज में पदस्थ एक प्राध्यापक को न केवल अपने संस्थान का प्रशासनिक प्रभारी बनाया गया है, बल्कि चितरंगी और रंपा महाविद्यालय का भी प्राचार्य प्रभार सौंप दिया गया है भौगोलिक दूरी स्वयं इस निर्णय की व्यवहारिकता पर प्रश्न उठाती है बैढ़न से चितरंगी लगभग 85 किलोमीटर दूर है, जबकि रंपा की दूरी भी कम नहीं ऐसे में क्या एक व्यक्ति तीन संस्थानों की शैक्षणिक गुणवत्ता, प्रशासनिक अनुशासन और वित्तीय पारदर्शिता की प्रभावी निगरानी कर सकता है? यह सवाल छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच स्वाभाविक रूप से उठ रहा है और भी आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि चितरंगी महाविद्यालय में नियमित प्राध्यापक एवं अतिथि विद्वान कार्यरत होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर किसी को प्रभार नहीं दिया गया यदि उपलब्धता और योग्यता मौजूद थी, तो फिर बाहरी प्रभार की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या यह निर्णय प्रशासनिक विवेक का परिणाम है या फिर व्यक्तिगत समीकरणों का?तीन माह पूर्व जिस प्राध्यापक को चितरंगी का प्रभार दिया गया था, उन्हें वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में हटा दिया गया किंतु प्रश्न यह है कि यदि आर्थिक निर्णयों की डीडीओ शक्ति बैढ़न स्तर पर केंद्रित थी, तो जांच का दायरा व्यापक क्यों नहीं बनाया गया? क्या जवाबदेही केवल एक व्यक्ति तक सीमित कर देना ही पर्याप्त है? शिक्षा संस्थानों में वित्तीय अनुशासन सर्वोपरि होना चाहिए, न कि चयनात्मक कार्रवाई।सूत्रों के अनुसार नए प्रभारी प्राचार्य का चितरंगी महाविद्यालय में दौरा भी सीमित रहा है यदि यह तथ्य सही है, तो शैक्षणिक गतिविधियों की निगरानी किस स्तर पर हो रही है? छात्र समस्याओं का निराकरण कैसे हो रहा है? और प्रशासनिक निर्णयों की समीक्षा कौन कर रहा है?शिक्षा कोई विभागीय औपचारिकता नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण की आधारशिला है यदि प्रभार वितरण में संतुलन, पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव रहेगा, तो इसका सीधा प्रभाव छात्रों के भविष्य पर पड़ेगा अब निगाहें उच्च शिक्षा विभाग भोपाल पर टिकी हैं आवश्यकता है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और व्यापक जांच हो यदि निर्णय नियमसम्मत है तो तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए, और यदि कहीं त्रुटि है तो सुधारात्मक कदम उठाए जाएं शिक्षा व्यवस्था मेहरबानी या प्रभाव का मंच नहीं हो सकती यहाँ हर निर्णय का पैमाना केवल योग्यता, पारदर्शिता और संस्थागत हित होना चाहिए अन्यथा “अंधा बांटे रेवड़ी” जैसी कहावतें केवल मुहावरे नहीं, व्यवस्था का आईना बन जाती हैं।

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