May 24, 2024

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कैसे रुकेगा हाथी और इंसानों के बीच का संघर्ष। विश्लेषण

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शहडोल । जिले के जनपद पंचायत जयसिंहनगर में 9 जंगली हाथियों का दल का मूवमेंट छत्तीसगढ़ जनकपुर से मसियारी वीट के ग्राम चितरांव के जंगलों मे 4 अप्रैल 2022 को देखा गया था, हाथियो के दल से ग्रामीणों को सुरक्षित रहने हेतु लगातार मुनादी एवं वाहन माइकिंग द्वारा सर्तक किया गया तथा हाथियों के दल के मूवमेंट के बारे में लोगों को समझाईश दी गई कि वे अकेले जंगलों में न जाएं और अंधेरे में जंगलों की ओर न निकले लेकिन इसके बावजूद ग्राम चितरावं के एक ही परिवार के दो व्यक्ति (पति-पत्नी) महुआ बिनने के लिए जंगल की ओर 5 अप्रैल 2022 को गए जहां हाथियों के दल का मूवमेंट था और हाथियों द्वारा कूचलने पर उनकी मृत्यु हो गई। इसी प्रकार हाथियों का दल का मूवमेंट ग्राम बांसा की ओर पहुंचा और बार-बार समझाइश के बाद भी बांसा के दो व्यक्ति (पति-पत्नी) एवं ग्राम नौगई की एक महिला जो उसी परिवार की रिश्तेदार थी, महुआ बिनने हाथियों के कुचलने से मौत हो गई।

जयसिंहनगर क्षेत्र के चितराँव एवं बाँशा ग्राम पंचायत में हाथियों के कुचलने से 5 लोगों की मौत के मामले से पूरे क्षेत्र सहित मध्य प्रदेश के भोपाल मुख्यालय तक में हड़कंप मच गया है। प्रशासनिक अमला अपने दावों के बीच लोगों के जान और माल की रक्षा हेतु हर संभव प्रयास उठाने की बात की जा रही है,वही जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच बैठकों का दौर रेस्क्यू टीम का गठन जैसे सुरक्षात्मक उपाय किए जा रहे हैं। इन सब घटनाओं के बीच कुछ महत्वपूर्ण सवाल जिसे जानना और उसका उपाय किए बिना हाथियों की समस्या का निराकरण मुश्किल लग रहा है।

आखिर क्यों हाथियों का झुंड छत्तीसगढ़ से मध्य प्रदेश की सीमा क्षेत्रों में आते हैं ?

विषय विशेषज्ञों के अनुसार हाथियों की प्रमुख नस्ल बिहार से मानी जाती है जहां पर जंगल,पानी एवं भोजन की कमी तो दूसरी तरफ हाथों की जनसंख्या में भारी वृद्धि के कारण हाथियों में परस्पर होने वाले आपसी संघर्ष के कारण हाथियों की मौत भी होती है वही एक बड़ा झुंड कई छोटे झुंड मैं बदल जाते हैं। ऐसे ही झुंड उस क्षेत्र को छोड़कर छत्तीसगढ़ के उन क्षेत्रों में जाने लगे जहां उन्हें जंगल पानी और भोजन अपने प्राकृतिक आवास के साथ मिल सके। छत्तीसगढ़ में हाथियों की जनसंख्या इस कदर बढ़ी की बिहार जैसी स्थिति छत्तीसगढ़ में भी हाथियों में निर्मित हो गई जहां हाथियों में परस्पर संघर्ष के कारण बड़े झुंड छोटे-छोटे झुंडो में बदल जाते हैं। वही बढ़ती जनसंख्या और घटते वन क्षेत्र के कारण अच्छे घने जंगल पानी की व्यवस्था की तलाश में नए प्राकृतिक आवास के रूप में हाथियों ने छत्तीसगढ़ से पलायन कर मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे सीधी,शहडोल, उमरिया,अनूपपुर में अपनी आवाजाही वर्ष 2000 के आसपास शुरू की थी। इसका प्रमुख कारण छत्तीसगढ़ की तुलना में मध्य प्रदेश के वन घनत्व एवं पानी की अच्छी व्यवस्था रही है। गौरतलब है की इस बात में कोई शंका नहीं कि मध्य प्रदेश के वन विभाग के प्रयासों के कारण मध्यप्रदेश का वन घनत्व बढ़ा है। वही पानी की सुगमता छत्तीसगढ़ की तुलना में मध्य प्रदेश के उक्त चारों जिलों के जंगली क्षेत्रों में ज्यादा बेहतर है। विषय विशेषज्ञ की अनुसार यदि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा वर्ष 2000 के आसपास जब छत्तीसगढ़ से हाथियों के झुंड का पलायन कर मध्य प्रदेश के सीमावर्ती चार जिलों में हाथियों के झुंड की आवाजाही शुरू हुई,यदि उस समय ही सरकार और प्रशासन द्वारा हाथियों को ट्रेंकुलाइज करके प्रशिक्षित कर लिया जाता तो पूरी तो नहीं लेकिन कुछ मात्रा में हाथी के उत्पात से बचाव किया जा सकता था। गौरतलब है वर्ष 2000 से पलायन कर आने वाले हाथियों के झुंड ने 2017 से अपना निवास मध्य प्रदेश के उक्त चारों जिलों के जंगलों में बना लिया है और वापस नहीं गय , हाथी और मानव के बीच संघर्ष को कैसे रोका जाए इस संबंध में कोई ठोस रणनीति अभी तक प्रशासन एवं सरकार द्वारा नहीं बनाई गई हो ऐसा नजर नहीं आता है। गौरतलब है की मध्य प्रदेश के जंगलों में हाथी की कमी भी है क्योंकि मध्य प्रदेश एक टाइगर स्टेट है और टाइगर के संरक्षण के लिए हाथी की विशेष आवश्यकता होती है प्रशासन द्वारा हाथियों को पकड़कर यदि प्रशिक्षित कर लिया गया होता तो एक तरफ हाथियों के उत्पात से भी बचा जा सकता था,वहीं दूसरी तरफ बाघ संरक्षण के लिए भी मील का पत्थर साबित हो सकता था। ऐसा सुझाव विशेषज्ञों द्वारा दिया जाता है।

क्या ऑपरेशन जामवंत से ली जा सकती है सीख !

शहडोल जिले के जैतपुर एवं केशवाही वन परिक्षेत्र में भालू का आतंक एक समय अखबार और चैनलों की सुर्खियां बटोरता रहा क्षेत्र में रहने वाले लोगो में महुआ,तेंदू व तेंदूपत्ता एवं साल बीज जैसे वनोपज के संग्रहण समय में आए दिन भालूओ के द्वारा लोगों को घायल करने एवं मौत की घाट उतारने की खबर सुनाई देती थी।जिसको वन विभाग द्वारा नियोजित तरीके से ऑपरेशन जामवंत शुरू किया जिसमें भालूओ को जंगलों के बीच में ही पीने के पानी और फलदार वृक्ष लगवाए गए रहने के लिए प्राकृतिक आवास विकसित किए गए,इस कदम से भालूओ और मानवो के बीच के संघर्ष को दूर करने का जमीनी प्रयास किया गया।भालू की आवाजाही आवासीय बस्तियों में कम हो गई और घटनाओं में काफी कमी आज देखने को मिलती है जहां उस समय भालू और इंसान के बीच संघर्ष की घटनाएं चर्चा का विषय बनी रहती थी वही आज शायद यदा-कदा ही ऐसी घटनाएं सुनने को मिलती



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