March 1, 2024

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कोविड-19: मंदी की दस्तक, क्या इससे निपटने के लिये आप तैयार हैं?

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कोरोना ने केवल एसेट की कीमतों और शेयर बाजारों को धराशायी नहीं किया है। इसने लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी असर डाला। इस बार शेयर बाजारों में देखी जा रही गिरावट बिल्कुल अलग तरह की है। पहले भी शेयर बाजार कई बार क्रैश कर चुके हैं। कभी सटोरियों ने खेल किया तो कभी कोई धोखे से लोगों का पैसा हड़प गया। किसी ने बहुत अधिक उधार लिया और उसे नहीं चुकाया तो कभी किसी ने बैलेंसशीट में हेरफेर कर डाली। इस बार ऐसी कोई हेरफेर या अटकल नहीं है। समस्या बिल्‍कुल अलग है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि मंदी चौखट पर दस्‍तक दे रही है। अगले साल पूरी तरह से इसका असर दिखने की आशंका है। अगले साल दुनिया की जीडीपी में ग्रोथ के अनुमान 2.5 फीसदी से नीचे आ गए हैं। जब उत्पादन रुक जाता है, तो यह अपेक्षित परिणाम है।

व्यवसायों को संचालन बंद करने के लिए मजबूर किया गया है। हर स्‍तर पर उत्पादन को नुकसान हुआ है। यह एक ‘स्टॉप एंड स्टार्ट’ यानी रुकने और चलने वाला चक्र नहीं है, क्योंकि असली अर्थव्यवस्था आपस में बहुत घुली-मिली और गुंथी है।

इसे उदाहरण से समझिए और इसकी कल्पना कीजिए। एक रेस्तरां बंद हो गया. उसका कच्‍चा बाना (सब्‍जी इत्‍यादि) बेकार चला जाता है। कर्मचारी काम पर आना बंद कर देते हैं। कुछ की नौकरी चली जाती है। इसलिए, वे आवश्यक चीजों के सिवा कुछ भी नहीं खरीदते हैं।

वहीं, व्यवसाय को अभी भी किराए, बिजली के बिलों का भुगतान करना है. सूखे किराने का पैसा फंसा है. यह तभी नि‍कलेगा जब यह उपभोग की वस्‍तु में बदलेगा और बेचा जाएगा. कोई राजस्व नहीं है, लेकिन खर्च और नुकसान बढ़ रहे हैं. बही-खाते कमजोर हो रहे हैं. ऐसे व्यवसाय को बैंकों से कार्यशील पूंजी की आवश्यकता होती है, जो बदले में मुश्किल का सामना करते हैं. यह कठिनाई होती है पैसे की सुस्‍त रफ्तार की क्‍योंकि मांग और आपूर्ति दोनों में कमजोरी आती है।

जिन कर्मचारियों के पास इनकम नहीं है, उन्हें रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए पर्सनल लोन की आवश्यकता होती है. चूंकि आमदनी लोगों और व्यवसायों दोनों के लिए कम है. इसलिए सरकार टैक्‍स के रूप में कम कमाती है।

आर्थिक गतिविधियों की कमी से सिस्‍टम में कम पैसा होता है और यह सभी को प्रभावित करता है. यह कहानी दुनिया भर की सभी अर्थव्यवस्थाओं और सेक्‍टरों पर लागू होती है. यही चिंता का विषय है।

इस महामारी ने सरकारों के हाथों में जबर्दस्‍त शक्तियां और जिम्मेदारी डाल दी है. यह एक ऐसी समस्या नहीं है जिससे आजमाए जा चुके तरीकों से निपटा जा सकता है. बजाय इसके सरकार को इससे निपटने के लिए खास तरह के मार्गदर्शन, आदेश और नियंत्रण की जरूरत है।

इस बात के सबूत हैं कि डंडा हांकने वाली सरकारों ने अनुपालन और नियंत्रण के साथ बेहतर किया है. सरकारी कार्रवाई पर निर्भरता का मतलब है कि मशीनरी की क्षमताओं के आधार पर प्रतिक्रियाएं अलग-अलग होगीं. रिकवरी केंद्रीय रूप से संचालित होगी. सरकारों के आगे लंबी सड़क है।

पहला, ब्याज दरों को नीचे लाने के अलावा कोई चारा नहीं है. उम्‍मीद है कि कम ब्‍याज दरों से माल और सेवाओं की मांग को सहारा मिलेगा. इससे अर्थव्यवस्थाओं को पटरी पर लाने में मदद मिलेगी।

ऐसे परिदृश्य में जहां आपूर्ति के लिए वस्‍तु और सेवाएं नहीं हों या बढ़ाने और विस्‍तार करने के लिए क्षमता नहीं हो, वहां मौद्रिक नीत‍ि कमजोर पड़ जाती है. लेकिन, ब्याज दरों को ऊंचा रखना उल्टा असर डालता है. यह पैसे के प्रवाह को बाधित करेगा और वसूली को चोट पहुंचाएगा. हम आर्थिक गतिविधि में सुधार होने तक ब्याज दरों को कम रखने के लिए दुनियाभर में मजबूत प्रयासों को देखेंगे।

दूसरा, जब सरकार लोगों को घर के अंदर रहने और काम के लिए नहीं जाने के लिए कहती है, तो अपनी आय खोने वालों के लिए मदद देने की जिम्मेदारी ज्‍यादा और वास्तविक हो जाती है।

हम परिणामों के बारे में चिंता कर सकते हैं. लेकिन कमजोर तबकों को पैसा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं हो सकता है, जो बिना आय के वित्तीय बर्बादी का सामना करेंगे. लाखों दिहाड़ी मजदूर बंदी के कारण काम से बाहर कर दिए गए हैं. व्यापक रूप से छंटनी, कटौती से अंत में बेरोजगारी आएगी. सरकार को उधारी के संसाधन खोजने होंगे क्‍योंकि कर संग्रह में कमी आएगी।

तीसरा, सरकारी राहत या प्रोत्साहन आर्थिक रिवाइवल के लिए एकमात्र आशा की किरण है. सरकारों को कर्ज का बोझ उठाना होगा और अर्थव्यवस्थाओं को दोबारा खड़ा करना होगा. अर्थव्यवस्था के अन्य इंजनों – निजी खपत, निवेश की मांग, निर्यात वृद्धि – सभी धीमा हो जाएगा और रिवाइवल में समय लगेगा।

सरकारी खर्च के बिना मंदी का प्रभाव गहरा होगा. मांग को बढ़ाने और लोगों और व्यवसायों के लिए अधिक धन रखने के लिए टैक्‍स कम करना अत्यावश्यक है. खराब आर्थिक माहौल का मतलब एसेट की बिक्री, निजीकरण से कमाने की गुंजाइश कम होना है. सरकार को भरोसा बहाल करना होगा।

चौथा, उधार लेने के माहौल को आसान करना होगा. भारत में क्रेडिट संकट के उफान और एक बड़े बैंक के तकरीबन फेल हो जाने के बीच उधार के नियमों को नरम करने की कल्पना करना कठिन है. लेकिन, हमारे पास कोई विकल्प नहीं है।

यहां तक कि अगर आरबीआई ब्याज दरों को नीचे लाता है, तो भी बैंक केवल व्यवसायों को उधार दे पाएंगे. वह भी तब होगा अगर केंद्रीय बैंक लिक्विडिटी को बढ़ाने के लिए असाधारण कदम उठाता है. इसका मतलब सीआरआर और एसएलआर को कम करना होगा. साथ ही प्रोविजनिंग के मानकों को दोबारा बदलना होगा. उधार देने के लिए प्रोत्साहन के बिना कोई रास्‍ता नहीं है।

पांचवां, ग्‍लोबल रिकवरी के लिए अर्थव्यवस्थाओं को आपस में सहयोग देना होगा. साथ ही इसके लिए तैयार रहना होगा. विकास के लिए जो अर्थव्‍यवस्‍थाएं विश्व व्यापार पर निर्भर हैं, उन्‍हें वापसी करने में अधिक समय लगेगा।

आर्थिक गतिविधियों के असमान चरणों का मतलब होगा कि चीन और दक्षिण कोरिया उत्पादन में लौट जाएंगे. लेकिन, ब्रिटेन और अमेरिका कम खपत और बंद की गिरफ्त में चले जाएंगे. खुशकिस्‍मती से भारत की इनसे तुलना नहीं हो सकती है क्‍योंकि इसकी घरेलू खपत बहुत ज्‍यादा है और इसकी बाहरी सेक्‍टरों पर निर्भरता कम है।

ऐसा बहुत कुछ है जो गंवाया जा चुका है और अगली तिमाही में जिसे पाना मुश्किल होगा. लिहाजा, मंदी के लिए तैयार रहें. यह मुहाने पर खड़ी हमें घूर रही है।

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