March 1, 2024

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मन का पश्चाताप

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ये कैसा गुनाह मुझसे हो गया |
ग्रहण तो सूर्य पर था चन्द्रमा क्यो खो गया |
सोचा ही नहीं रात के बारे में ये धोखा,
मुझसे कैसे हो गया |
ग्रहण तो दोनो मे लगते हैं फिर चांद पर ही दाग कैसे रह गया|
न जाने वो मंजर कौन सा था न जाने वो नस्तर कौन सा था |
कि चोंट लगी भी नहीं जख़्म गहरा कर गया|
न खंजर था मेरे हाथों में न आंखों में जार था फिर कैसी चली हवा कि मां का दामन तार तार हो गया|
आंसू तो आते ही नहीं अब ये कैसी गिला है|
कि सब कुछ सूखा हो गया |
न सनम हूं किसी का न मोहब्बत है कोई मेरी |
फिर भी मैं बदनाम हो गया ||

कवि कुमार श्री अतुल तिवारी जी

सतना


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