March 3, 2024

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जीवन में सुख शांति और सफलता चाहिए तो पात्रता का विकास करें

व्यक्ति का चिन्तन, चरित्र, आदर्श एवं व्यवहार को ऊँचा उठाना ही अध्यात्म कहलाता है।
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हमें अपने जीवन में पात्रता का विकास करना चाहिए क्योंकि पात्र व्यक्ति को ही बहुमूल्य ज्ञान भक्ति व संपदा की प्राप्ति हो सकती है कुपात्र को नहीं इसलिए प्रत्येक दिन भगवान की भक्ति से एवं योग से ध्यान से प्राणायाम से अपने जीवन की पात्रता का विकास करें।

आज हर व्यक्ति समस्याओं के जाल में निरन्तर उलझता जा रहा है। इसका प्रमुख कारण है व्यक्ति के अन्दर आध्यात्मिक दृष्टिकोण का अभाव।

हमें हर प्रकार से यह समझ लेना चाहिए कि मनुष्य के विकास के लिए उसके सामने दो ही रास्ते हैं—(१) भौतिकवादी रास्ता और (२) आध्यात्मिक रास्ता। चाहे तो आप इसे प्रेय एवं श्रेय मार्ग भी कह सकते हैं।

मनुष्य में उत्कृष्ट चिन्तन की पृष्ठभूमि बनाने का काम अध्यात्म करता है। आत्मा में विद्यमान परमात्मा को हम कैसे विकसित करें, इस विद्या का नाम अध्यात्म है, परन्तु आज का मनुष्य तो पूजा-पाठ, कर्मकाण्ड, अनुष्ठान तथा हनुमानजी को प्रसाद चढ़ा देने की प्रतिमा को ही अध्यात्म क्या, सब कुछ मान बैठा है। यह उसकी भूल है। वास्तव में अध्यात्म का मतलब है—आदमी के चिन्तन, चरित्र, आदर्श एवं व्यवहार को ऊँचा उठाना जो इस तथ्य को जानता है, वही सच्चा अध्यात्मवादी है।

प्रायः लोग मनौती मानने और प्रसाद चढ़ा देने, धूपबत्ती, अगरबत्ती जला देने और पूजा-पाठ को ही अध्यात्म मान बैठते हैं। वे नहीं जानते कि देवता बहुत ही व्यस्त होते हैं। एक कम्पनी को सँभालने में मैनेजर का कचूमर निकल जाता है, फिर भगवान को तो सारी सृष्टि का नियन्त्रण करना पड़ता है। अतः उसके पास उतना समय कहाँ जो आपके प्रसाद के लिए दौड़ा चला आवे और आशीर्वाद, वरदान दे जाए। भगवान मूर्ख नहीं है जो आपकी माला और पूजा से प्रसन्न हो जाए।

आपको अपने चरित्र एवं व्यक्तित्व को ऊँचा उठाना होगा तभी परमात्मा की अनुकम्पा आपको मिल सकती है। इसके लिए ऋषियों ने चार साधनाएँ बतलायी हैं, जो मनुष्य को करनी चाहिए।

वे हैं—‘सादा जीवन उच्च विचार’, ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’, ‘लोष्ठवत् परद्रव्येषु’ एवं ‘मातृवत् परदारेषु।’ इन सूत्रों को अपनाकर ही हम अध्यात्मवादी बन सकते हैं तथा हमारे अन्दर अध्यात्म का बल—‘आत्मबल’ आ सकता है। – पंडित प्रशांत चतुर्वेदी (ज्योतिष एवं अध्यात्म गुरु )



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